तीन तलाक कानून – एक चर्चा विस्तार

                 Photo Courtesy – Google

 

इस्लाम में निकाह एक पुरूष और एक स्त्री की अपनी आज़ाद मर्ज़ी से एक दूसरें के साथ पति और पत्नी के रूप में रहने का फ़ैसला हैं। इस्लाम मे निकाह एक संविदा है। पति पत्नी के भावुक और सात जन्म तक के काल्पनिक बंधन के विपरीत, इस्लाम मे निकाह को अधिक व्यवहारिक धरातल पर रख कर देखा गया है। चूंकि, यह संविदा है, इसलिए इसमें कुछ शर्ते भी हैं।

जैसे पुरूष वैवाहिक जीवन की ज़िम्मेदारियों को उठाने की शपथ ले, एक निश्चित रकम जो आपसी बातचीत से तय हो, मेहर के रूप में औरत को दे और इस नये सम्बन्ध की समाज में घोषणा हो जाये। चूंकि निकाह एक संविदा है। औरत और मर्द आपसी सहमति से इस लिखित संविदा जिसे निकाहनामा कहते हैं से बंधे रहते है अतः इस्लाम में उक्त निकाह यानी संविदा विच्छेद का भी प्राविधान है जिसे तलाक़ कहा गया हैं।

इस्लामी कानूनी के मर्मज्ञ इस बात पर एकमत है कि इस्लाम मे तलाक़ का प्राविधान तो है पर उसे जटिल बनाया गया है ताकि तलाक़ का फैसला करते समय उसे आसानी से अमल में न लाया जा सके। तलाक, तलाक़, तलाक एक बार मे नहीं बल्कि कुछ अंतराल के बाद कहने की प्रक्रिया है ताकि इन अंतरालों में हो सकता है पति का मन बदल जाए, गिले शिकवे दूर हों जाय और परिवार बिखरने से बच जाय। क्योंकि यह मान लिया गया है कि तलाक़ का कारण कुछ भी हो इससे, परिवार और रिश्ते बिखरते ही हैं।

कुरान में कहा गया है कि जहाँ तक संभव हो, तलाक़ न दिया जाए और यदि तलाक़ देना ज़रूरी और अनिवार्य हो जाए तो कम से कम यह प्रक्रिया अपनायी जाय। क़ुरआन में तलाक़ प्रक्रिया की समय अवधि भी स्पष्ट रूप से बताई गई है। एक ही क्षण में तलाक़ का सवाल ही नहीं उठता। खत लिखकर, टेलीफ़ोन पर या आधुनिकाल में ईमेल, एस एम एस अथवा वॉट्सऍप के माध्यम से एक-तरफा और ज़ुबानी या अनौपचारिक रूप से लिखित तलाक़ की इजाज़त इस्लाम कतई नहीं देता। एक बैठक में या एक ही वक्त में तलाक़ दे देना गैर-इस्लामी है।

तलाक़ की प्रक्रिया, शरीयत , जिसे शरीया क़ानून या इस्लामी क़ानून भी कहा जाता है में दी गयी है। इस क़ानून का आधार इस्लाम का सर्वोच्च धर्मग्रन्थ क़ुरआन है और इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद द्वारा दी गई मिसालें हैं , जिन्हें सुन्नाह यानी परम्परायें कहा जाता है। इस्लामी क़ानून की व्याख्याएं, इन दो स्रोतों को ध्यान में रखकर की जातीं हैं। इस क़ानून बनाने की प्रक्रिया को ‘फ़िक़्ह’ कहा जाता है। मुसलमान यह तो मानते हैं कि शरीयत अल्लाह का क़ानून है लेकिन उनमें इस बात को लेकर मतभेद है कि यह क़ानून कैसे परिभाषित और लागू होना चाहिए।

सुन्नी समुदाय में चार भिन्न भिन्न फ़िक़्ह के नज़रिए हैं और शिया समुदाय में दो। अलग अलग देशों, समुदायों और संस्कृतियों में भी शरीयत को अलग-अलग ढंगों से समझा जाता है। इस्लाम के अनुयायियों के लिए शरीयत इस्लामी समाज में रहने के तौर-तरीक़ों, नियमों और कायदों के रूप में क़ानून की भूमिका निभाता है। पूरा इस्लामी समाज इसी शरीयत क़ानून के हिसाब से चलता है। मोहम्मडन लॉ या इस्लामी कानून भी अलग अलग तरीक़ों से व्याख्यायित है। लेकिन निकाह एक संविदा है और तलाक उक्त संविदा भंग का एक उपाय यह लगभग सभी फिरकों में है।

तलाक़ को लेकर इधर एक विवाद उठ खड़ा हुआ है कि एक ही बार मे तीन तलाक़ जिसे तलाक़ ए बिद्दत (ट्रिपल तलाक़) कहते हैं, के अंतर्गत जब कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को एक बार में तीन तलाक़ बोल, या फ़ोन, मेल, मैसेज या पत्र के ज़रिए तीन तलाक़ कह, लिख कर दे देता है तो इसके तुरंत बाद तलाक़ हो जाता है, तो क्या इस तलाक़ को इस्लामी कानूनी के अनुसार जायज़ माना जाय ? ट्रिपल तालक़, जिसे तलाक़-ए-बिद्दत, तत्काल तलाक़ और तालक़-ए-मुघलाजाह (अविचल तलाक़) के रूप में भी जाना जाता है, इस्लामी तलाक़ का एक रूप है जिसे भारत में मुसलमानों द्वारा इस्तेमाल किया गया है, विशेषकर हनफ़ी पन्थ के अनुयायी सुन्नी इस्लामी स्कूल इसे मानते हैं।

लेकिन इस्लामी कानूनों के जानकार इस प्रकार के तलाक को जायज़ नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि इस प्रकार का तलाक कुरआन की भावना और शरियत की मंशा के विपरीत है। लेकिन दुर्भाग्य से सबसे अधिक तलाक़ इसी प्रथा से हो रहे है। इस प्रथा के औचित्य और अनौचित्य पर देश और मुस्लिम समाज मे भी बहुत बहसें हुयीं और यह मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट में इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवायी, मुख्य न्यायाधीश ( सीजेआई ) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने की। सुनवायी के बाद पीठ ने अपने 365 पेज के फ़ैसले में 3:2 के बहुमत के फैसले से ‘तलाक़-ए-बिद्दत’’ तीन तलाक़ को निरस्त कर दिया। अदालत का फैसला शरियत का कहीं उलंघन नहीं करता है। क्योंकि शरियत में भी ट्रिपल तलाक़ को मान्यता नहीं दी गयी है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद से देश में लोकसभा ने मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक, 2017 को पारित कर दिया है । पारित विधेयक के अहम बिंदु इस प्रकार हैं:
● धारा 3. मुस्लिम पति द्वारा शाब्दिक तौर पर, चाहे मौखिक या लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप में या किसी भी दूसरे तरीके से, अपनी पत्नी को तलाक दिया जाना अवैधानिक/अमान्य और गैर कानूनी होगा.
● धारा 4. कोई मुस्लिम पति, जो अपनी पत्नी को अनुच्छेद 3 में वर्णित तरीके से तलाक देता है, उसे तीन साल तक की कैद की सजा दी जाएगी साथ ही उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा।

सरकार का तर्क है कि गलत तरह से तलाक के कारण पीड़ित मुस्लिम महिलाएँ इस कानून से राहत पाएंगी। सरकार ने इस कानून के माध्यम से स्वयं को मुस्लिम महिलाओं का हितचिंतक दिखने की कोशिश की है। हालांकि विधेयक जहां तक तलाक़ ए बिद्दत को रोकने की बात करता है वहां तक तो वह शरीयत के भावना के अनुरूप है और तीन बार तलाक़ कह देने से तलाक़ का होना भी नहीं होता है, पर तीन तलाक़ कहने वाले को तीन साल की कारावास की सज़ा का प्राविधान तर्कसंगत नहीं लगता है।

मूल कानूनी प्रश्न यह भी उठता है कि तलाक़ हुआ ही नहीं तो सज़ा किस बात की ? यह तर्क दिया जाएगा कि तीन तलाक़ बोलने की यह सजा है । लेकिंन, पति पत्नी की वैवाहिक स्थिति तो वही रही। फिर जेल के बाद जब पति लौटेगा तो क्या परिवार की सामान्यता रह पाएगी ? फिर इन तीन सालों में पत्नी और अगर बच्चे हों तो उनका भरण पोषण कौन करेगा ? क्या सजायाफ्ता पति लौट कर पुनः निर्विकार भाव से एक शरीफ पतिं की तरह घर मे रह सकेगा ? अगर वह किसी नौकरी में है तो क्या तीन साल की सज़ा के बाद भी उसकी वह नौकरी बरक़रार रहेगी ? सामाजिक प्रतिष्ठा पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? आदि आदि अनेक सवाल इस सज़ायाबी वाले प्राविधान से और उठ खड़े हुये हैं। धर्म और न्यायशास्त्र के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाले इस विधेयक में कई कमियां हैं, जिससे यह साबित होता है इसे ड्राफ्ट करते समय बहुत सी सम्भावनाओ पर विचार नहीं किया गया है और इसका उद्देश्य लैंगिक न्याय, जैसा कि दावा किया गया है, नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अरविंद जैन ने एक वाजिब सवाल उठाया है। उनके अनुसार, ” भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 के अनुसार पत्नी से कानूनी बलात्कार का अधिकार, व्यभिचार (धारा 497) और समलैंगिकता (धारा 377) कोई अपराध नहीं..अब सब संवैधानिक है…कोई अपराध नहीं। दहेज केस के किसी अपराधी की गिरफ्तारी तक नहीं, मगर तीन तलाक़ देने की कहने वालों को तीन साल के लिए, जेल। यह अपराध भी संज्ञेय और गैर-जमानती। पति जेल में और परिवार सड़क पर। पत्नी-परिवार के पालन-पोषण का क्या इंतज़ाम किया? इसका फैसला मजिस्ट्रेट करेगा ! ” न्याय की यह कैसी अवधारणा ?

एक और कानूनी विसंगति इस विधेयक के साथ है। आईपीसी की धारा 494 के अनुसार पति-पत्नी के रहते, दूसरा विवाह करने की सज़ा सात साल है मगर यह अपराध असंज्ञेय और जमानत योग्य है लेकिन इस तीन तलाक़ बिल में की सज़ा तीन साल और अपराध संज्ञेय तथा गैर-जमानती ! क्यों ? दूसरा विवाह करना, तीन तलाक़ से कम गम्भीर अपराध है, तो बहुविवाह की सज़ा सात साल क्यो ?

लोकसभा में पारित तीन तलाक को अपराध बनाने वाले कानून को लेकर चली बहस एक साधारण सवाल के इर्द-गिर्द घूमती रही थी कि, जब शादी एक दीवानी करार है और सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही फौरी तीन तलाक़ को अवैध घोषित कर दिया है, तो किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी को कानून द्वारा अमान्य ठहरा दिए गए तरीके से तलाक देने की कोशिश करने के लिए सजा देने की जरूरत क्या है ? यह सजा किस अपराध की है यह तो कानून स्पष्ट ही नहीं करता है !

इसका एक दुष्परिणाम यह होगा कि लोग, अपनी पत्नी को बिना तीन बार तलाक बोलकर घर से निकाल देने और सज़ा से बच कर परित्याग करने का कायरतापूर्ण उपाय अपनाएंगे जिससे और समस्याएं उतपन्न होंगी। परित्याग चूंकि कोई कानूनी अपराध नहीं है अतः पति को किसी कानूनी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा. और छोड़ी गई पत्नी बिना तलाक़ ही तलाकशुदा जीवन बिताने के लिये बाध्य होगी।

समाज को नियंत्रित करने के लिये कानूनों की अवधारणा हुयी है। पर यह भी एक कटु सत्य है कि समाज की बुराइयों को केवल कानून बनाकर ही खत्म नहीं किया जा सकता है। दहेज प्रथा, अस्पृश्यता, आदि सामाजिक बुराइयों के खिलाफ कानून बने हैं पर वे बुराइयां कम तो हुयी हैं पर खत्म नहीं हुयी है। यह मुस्लिम समाज को सोचना है कि वे कैसे तीन तलाक़ की कुप्रथा जो उनकी किताबों के ही अनुसार मान्य नहीं है से कैसे बचा जाय।

 

लेखक- विजय शंकर सिंह, उत्तर प्रदेश कैडर के अवकाशप्राप्त आईपीएस हैं। मूल रूप से वाराणसी के रहने वाले हैं। इनकी शिक्षा, उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हुयी है। अवकाशप्राप्ति के बाद करेंट अफेयर्स और विभिन्न कानूनी विषयों पर लिखते रहते हैं।

Share This
COMMENTS

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *